तकदीर का मतलब यह नहीं है कि अल्लाह हमें पाप करने के लिए “मजबूर” करता है, बल्कि इसका मतलब यह है कि अल्लाह का ज्ञान (Knowledge) इतना असीमित है कि उसे पहले से पता है कि हम अपनी स्वतंत्र इच्छा (Free Will) से क्या चुनने वाले हैं।
तकदीर क्या है? (अल्लाह का पहले से जानना)
”पृथ्वी में या तुम्हारे अपने आप में कोई भी मुसीबत ऐसी नहीं आती जो हमारे उसे पैदा करने से पहले एक किताब (लौह-ए-महफूज़) में न हो।” (सूरह अल-हदीद 57:22)
तर्क: यह आयत बताती है कि अल्लाह ‘Time’ (समय) की सीमा से बाहर है। उसे पहले से पता है कि भविष्य में क्या होने वाला है। लेकिन ‘पता होने’ का मतलब ‘मजबूर करना’ नहीं है। जैसे एक टीचर को पता होता है कि कौन सा छात्र फेल होगा क्योंकि वह उसकी आदतों को जानता है, लेकिन छात्र अपनी मेहनत की कमी से फेल होता है, टीचर के लिखने से नहीं। और जैसे एक मौसम विज्ञानी को पता होता है कि कल बारिश होगी, लेकिन उसकी भविष्यवाणी बारिश का कारण नहीं होती।
इंसान को रास्ता दिखाया गया (Guide to Path)
”बेशक, हमने उसे (इंसान को) रास्ता दिखा दिया है; अब चाहे वह शुक्रगुज़ार बने या नाशुक्रा (इन्कारी)।” (सूरह अद-दह्र 76:3)
तर्क: यहाँ अल्लाह स्पष्ट कर रहा है कि उसने इंसान को ‘रोबोट’ नहीं बनाया। उसने नक्शा (कुरान) दे दिया है, लेकिन उस पर चलना या न चलना इंसान का अपना फैसला है।
चुनाव की पूर्ण स्वतंत्रता (Absolute Freedom of Choice)
”और कहो: सत्य तुम्हारे रब की ओर से है। अब जो चाहे मान ले और जो चाहे इनकार कर दे।” (सूरह अल-कहफ़ 18:29)
तर्क: यह आयत तकदीर के ‘मजबूरी’ वाले तर्क को पूरी तरह खारिज कर देती है। अगर सब कुछ अल्लाह ने जबरन तय किया होता, तो वह ‘जो चाहे’ (Whosoever wills) जैसे शब्दों का प्रयोग नहीं करता। सज़ा ‘सत्य’ को जानकर भी ‘इंकार’ चुनने की है।
व्यक्तिगत जिम्मेदारी और क्षमता (Capacity & Burden)
”अल्लाह किसी जान पर उसकी सामर्थ्य से अधिक बोझ नहीं डालता। उसने जो (नेकी) कमाई वह उसके लिए है और जो (बुराई) कमाई वह उस पर (बोझ) है।” (सूरह अल-बकरा 2:286)
तर्क: न्याय का सिद्धांत कहता है कि सज़ा केवल तभी दी जा सकती है जब व्यक्ति के पास उस काम को न करने की ‘क्षमता’ हो। अल्लाह ने हमें बुराई से बचने की क्षमता दी है, इसीलिए हम अपने ‘कमाने’ (Acquisition) के लिए जवाबदेह हैं।
न्याय का अंतिम प्रमाण (No Injustice)
”जो कोई नेक काम करता है, वह अपने ही भले के लिए करता है, और जो कोई बुराई करता है, उसका बुरा असर उसी पर होता है। और तुम्हारा रब अपने बंदों पर ज़रा भी ज़ुल्म करने वाला नहीं है।” (सूरह फुस्सीलत 41:46,)
तर्क: यह आयत इस बहस को समाप्त कर देती है। यदि अल्लाह खुद पाप करवाता और फिर सज़ा देता, तो वह ‘ज़ुल्म’ (अन्याय) होता। चूंकि अल्लाह ‘अदल’ (न्याय) करने वाला है, कुरान स्पष्ट करता है कि इंसान को सोचने और चुनने की आज़ादी दी गई है, और सज़ा उसी “चुनाव” (Choice) की मिलती है।
इम्तिहान का उद्देश्य (Objective of Examination)
”उसने मृत्यु और जीवन को इसलिए पैदा किया ताकि तुम्हें आज़माए कि तुममें से कर्म में कौन सबसे अच्छा है।” (कुरान – सूरह अल-मुल्क 67:2)
तर्क: अल्लाह ने इस जीवन को एक परीक्षा (Test) बनाया है। यदि सब कुछ पहले से तय और मजबूर होता, तो परीक्षा का कोई अर्थ नहीं रह जाता।
निष्कर्ष (Conclusion)
”तकदीर अल्लाह का ‘Data Bank’ है, इंसान की ‘Handcuff’ (हथकड़ी) नहीं। अल्लाह ने 57:22 में बताया कि वह सब जानता है, लेकिन 76:3 और 18:29 में हमें चुनने की आज़ादी दी। 2:286 और 41:46 यह सुनिश्चित करते हैं कि सज़ा केवल हमारे अपने फैसलों की है। पाप की सज़ा इसलिए मिलती है क्योंकि ‘चुनाव’ हमारा था, अल्लाह का नहीं।”